तेल की कीमत अगर 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती है तो सरकार के फिस्कल गणित पर बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है. लेकिन कमजोर होता रुपया सरकार के लिए नई चुनौती बन सकता है क्योंकि इससे आयात महंगे होंगे और खास तौर पर खाद और एलपीजी सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है.
हाल ही में भारतीय मुद्रा ने नया रिकॉर्ड निचला स्तर छुआ जब भारतीय रुपया 92.15 प्रति डॉलर तक फिसल गया. यह पहली बार है जब रुपया 92 प्रति डॉलर के पार गया. वैश्विक निवेशक अनिश्चितता के दौर में सुरक्षित निवेश की तरफ बढ़ रहे हैं, जिससे डॉलर और गोल्ड की मांग बढ़ी है.
कमजोर रुपया बढ़ा सकता है सब्सिडी का बोझ
सरकारी सूत्रों के मुताबिक अगर रुपया लगातार कमजोर होता रहा तो सरकार का सब्सिडी बिल बढ़ सकता है. इसका सबसे ज्यादा असर खाद सब्सिडी पर पड़ने की आशंका है क्योंकि उर्वरकों के उत्पादन में बड़ी मात्रा में आयातित कच्चे माल का इस्तेमाल होता है.
वित्त वर्ष 2027 के लिए सरकार ने खाद सब्सिडी का अनुमान करीब 1.70 लाख करोड़ रुपये रखा है. वहीं वित्त वर्ष 2026 में संशोधित अनुमान के मुताबिक यह खर्च करीब 1.86 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो बजट अनुमान से करीब 18 हजार करोड़ रुपये ज्यादा है.
कमजोर रुपये का असर एलपीजी सब्सिडी पर भी पड़ सकता है. वित्त वर्ष 2026 में एलपीजी सब्सिडी का संशोधित अनुमान करीब 15,120 करोड़ रुपये रहा, जो बजट अनुमान से करीब 3,000 करोड़ रुपये ज्यादा था. वित्त वर्ष 2027 के लिए इसे घटाकर करीब 12,084 करोड़ रुपये रखा गया है.
80 डॉलर तेल से फिलहाल नहीं पड़ेगा बड़ा असर
सरकारी आकलन के मुताबिक अगर कच्चे तेल की कीमत करीब 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है तो पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. लेकिन अगर कीमत 100 डॉलर के करीब पहुंचती है तो सरकार के सामने मुश्किल हालात बन सकते हैं.
वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत हाल ही में 82 से 84 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई. इसकी बड़ी वजह मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज के आसपास पैदा हुआ संकट है, जो दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है.
भारत की ऊर्जा निर्भरता बढ़ाती है जोखिम
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है. साथ ही देश की करीब आधी एलएनजी जरूरत भी विदेशों से आती है. इनमें से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होर्मूज जलडमरूमध्य के रास्ते ही होती है. अगर इस मार्ग पर लंबे समय तक बाधा बनी रहती है तो वैश्विक बाजार में तेल और गैस की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है. इससे कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिसका असर भारत के चालू खाते के घाटे और महंगाई पर भी पड़ सकता है. फिलहाल सरकार और विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति पर नजर रखी जा रही है और अभी फिस्कल गणित पर तत्काल बड़ा असर नहीं दिख रहा है. लेकिन अगर मध्य पूर्व का तनाव लंबा खिंचता है और तेल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो आने वाले समय में आर्थिक दबाव बढ़ सकता है.
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जय ठाकुर 2018 से खबरों की दुनिया से जुड़े हुए हैं. 2022 से News18Hindi में सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं और बिजनेस टीम का हिस्सा हैं. बिजनेस, विशेषकर शेयर बाजार से जुड़ी खबरों में रुचि है. इसके अलावा दे…और पढ़ें
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