पहला मिथक यह है कि एसआईपी शुरू करते ही हमेशा बहुत अच्छा रिटर्न मिलता है. कई नए निवेशक सोचते हैं कि एसआईपी में पैसा डालते ही साल दर साल अच्छा और स्थिर रिटर्न मिलेगा. सोशल मीडिया पर फिनफ्लुएंसर और पोस्ट्स से यह धारणा और मजबूत हो गई है कि बस एसआईपी कर लो, जल्दी करोड़पति बन जाओगे. लेकिन हकीकत इससे बहुत अलग है. एसआईपी में अच्छा रिटर्न पाने के लिए समय, अनुशासन और सही परिस्थितियां जरूरी होती हैं. अगर फंड की स्ट्रैटेजी कमजोर है, उसका पिछला रिकॉर्ड अस्थिर है या लगातार कम प्रदर्शन कर रहा है, तो एसआईपी भी अच्छा रिटर्न नहीं देगा. एसआईपी बस इतना करता है कि अलग-अलग मार्केट लेवल पर निवेश होता है, जिससे रिस्क थोड़ा फैल जाता है और उतार-चढ़ाव कम महसूस होता है. तीन चीजें एसआईपी के रिजल्ट तय करती हैं – सही समय अवधि, सही फंड चुनना और सही कैटेगरी. छोटे समय में बड़ा रिटर्न उम्मीद करना गलत है. असली कमाई 7, 10 या 15 साल जैसे लंबे समय में होती है.
हर पॉपुलर फंड में एसआईपी
दूसरा मिथक है कि हर पॉपुलर फंड में एसआईपी शुरू कर देना चाहिए. नए लोग देखते हैं कि सोशल मीडिया पर कोई फंड ट्रेंडिंग है या रेटिंग साइट पर टॉप पर है, तो तुरंत उसमें एसआईपी शुरू कर देते हैं. सोचते हैं जितने ज्यादा फंड उतना ज्यादा फायदा. कई लोगों के पास 8-10 फंड हो जाते हैं, जिनमें से आधे को वे समझते भी नहीं. यह तरीका गलत है. इससे पोर्टफोलियो भारी और जटिल हो जाता है. सच्चाई यह है कि एसआईपी का असली फायदा तब मिलता है जब पूरा पोर्टफोलियो आपकी जरूरत, रिस्क लेने की क्षमता और गोल के हिसाब से बनाया जाए. एक ही कैटेगरी में 3-4 मिडकैप फंड डालने से सिर्फ स्टॉक ओवरलैप होता है, डाइवर्सिफिकेशन नहीं. बेहतर है कि 3-5 अच्छे फंड चुनें – जैसे लार्जकैप, फ्लेक्सीकैप, मिडकैप या हाइब्रिड – और उन्हें अपने गोल जैसे बच्चे की पढ़ाई, घर खरीदना या रिटायरमेंट के हिसाब से बैलेंस करें.
एसआईपी कभी नहीं रोकनी चाहिए
तीसरा मिथक है कि एसआईपी शुरू कर दिया तो कभी नहीं रोकना चाहिए. कई लोग मानते हैं कि बीच में रोकना गलत है, इससे रिटर्न कम हो जाएगा. लेकिन जिंदगी में इनकम बदलती है, नौकरी बदलती है, अचानक खर्च आते हैं या नए गोल बनते हैं. ऐसे में एसआईपी रोकना या बदलना जरूरी हो सकता है. सच यह है कि एसआईपी कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं है. आप कभी भी रोक सकते हैं, पॉज कर सकते हैं या बदल सकते हैं. आजकल कई कंपनियां एसआईपी पॉज की सुविधा देती हैं, जिससे 3-6 महीने के लिए रोककर फिर शुरू कर सकते हैं. अगर फंड का परफॉर्मेंस गिर रहा है या आपकी स्ट्रैटेजी बदल गई है, तो नए बेहतर फंड में शिफ्ट कर सकते हैं.
चौथा मिथक है कि जब मार्केट गिरे या एसआईपी अच्छा रिटर्न न दे तो रोक देना चाहिए. मार्केट डाउन होने पर एनएवी गिरता है, अस्थायी नुकसान दिखता है और लोग घबरा जाते हैं. लेकिन एसआईपी के लिए मार्केट गिरना फायदेमंद होता है. कम कीमत पर ज्यादा यूनिट मिलती हैं, जिससे एवरेज खरीद मूल्य कम होता है. जैसे 5000 रुपये में अगर एनएवी 100 है तो 50 यूनिट मिलती हैं, लेकिन एनएवी 80 होने पर 62.5 यूनिट मिलती हैं. बाद में मार्केट ऊपर जाने पर ये अतिरिक्त यूनिट ज्यादा कमाई देती हैं. एसआईपी की पूरी ताकत उतार-चढ़ाव में ही काम करती है. रोकने से सस्ते में खरीदने का मौका चूक जाते हैं.
बिना रिसर्च के कोई भी फंड चुनना
पांचवां मिथक है कि एसआईपी खुद एक प्रोडक्ट है, कोई भी एसआईपी कर लो फायदा होगा. लोग सोचते हैं जैसे बैंक एफडी एक प्रोडक्ट है वैसे ही एसआईपी. इससे बिना रिसर्च के कोई भी फंड चुन लेते हैं. सच यह है कि एसआईपी कोई अलग प्रोडक्ट नहीं, बस एक तरीका है जिससे हर महीने फिक्स्ड अमाउंट म्यूचुअल फंड में डाला जाता है. असली फायदा फंड की क्वालिटी पर निर्भर करता है. अगर फंड अच्छा नहीं है, उसका पोर्टफोलियो कमजोर है या परफॉर्मेंस औसत है, तो एसआईपी भी अच्छा रिटर्न नहीं देगा. इसलिए पहले फंड का इतिहास, फंड मैनेजर का अनुभव, स्ट्रैटेजी और अपना रिस्क प्रोफाइल देखकर चुनें. एसआईपी सुविधा है, असली ताकत सही फंड में है.
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