लोको पायलट के सामने कई बार यह समस्या आती है कि दो स्टेशनों के बीच में उसे टायलेट लगती है. मजबूरी में उसे अगले स्टेशन तक इंतजार करना पड़ता है. वहां पहुंचकर टायलेट जाना पड़ता है. कई बार स्टेशन काफी दूरी होते हैं, जहां पहुंचने में समय लगता है, ऐसे में लोको पायलट को परेशानी होती है.
इनको राहत देने के लिए भारतीय रेलवे ने मेल-एक्सप्रेस के इंजनों में टॉयलेट बनवाने की शुरुआत पहले ही कर चुकी है. चूंकि वंदेभारत सेमी हाई स्पीड ट्रेन है. इसमें अलग से इंजन नहीं है, पावर कार होती है. इसी पॉवर कार में टॉयलेट बनवाने की शुरुआत हुई है. इस तरह यात्रियों के साथ साथ इस ट्रेन के लोको पायलटों को भी खास सुविधा मिलेगी.
चेयरकार और स्लीपर के कोच में फर्क
वंदेभारत चेयरकार 8,16 और 20 कोचों की है. लेकिन चलने वाली स्लीपर वंदेभारत में 16 कोच हैं. इसमें 11 थर्ड एसी, 4 सेकंड एसी और 1 फर्स्ट एसी कोच शामिल हैं. ट्रेन में कुल 823 यात्री सफर कर सकेंगे.
सफर बेहतर करने के लिए ये सुविधाएं
यात्रियों के लिए इसमें आरामदायक और मुलायम बर्थ, कोचों के बीच ऑटोमैटिक दरवाजे और वेस्टीब्यूल, बेहतर सस्पेंशन और कम शोर की सुविधा दी गई है, जिससे सफर ज्यादा आरामदायक होगा.
स्लीपर में और क्या हुए बदलाव
चूंकि ट्रेन सेमी हाईस्पीड है, इस वजह से सामान्य ट्रेनों के मुकाबले स्पीड तेज है. इसकी स्पीड 180 किमी. प्रति घंटे की है. इस वजह से मौजूदा वंदेभारत के सामने कई बार जानवर आ जाते हैं और इंजन वाले हिस्से को नुकसान पहुंचता है. कई बार ट्रेन को रोकना पड़ता है. इस वजह से स्लीपर की नोज को पहले से अधिक मजबूत बनाया गया है, जिससे जानवर के टकराने से नुकसान कम से कम या न हो. नोज को डिजाइन करते समय इस बात का ध्यान रखा गया है कि जानवर के टकराने के बाद ट्रेन की एनर्जी पर कोई फर्क न पड़े, जिससे स्पीड प्रभावित न हो. अगर जानवर टकराता है वो उसका प्रभाव कम से कम पड़े.
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