पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नौकरी की बजाय खुद का कुछ करने का फैसला किया. 1980 के दशक में जब वे युवा थे, तब मुंबई की भीड़भाड़ वाली गलियों में मसालों की दुकानें आम थीं, लेकिन ज्यादातर लोग घरेलू मसाले इस्तेमाल करते थे. जवाहरलाल झावेरी ने सोचा क्यों न अच्छी क्वालिटी के मसाले पैक करके बेचे जाएं.
मसाले घर-घर जाकर देना शुरू किया
उन्होंने कुछ पैसे जोड़कर एक छोटी सी दुकान खोली और मसाले खुद पीसकर पैक करने लगे. पहले दिन साइकिल पर सामान लेकर आसपास की दुकानों और घरों में बेचते थे. ग्राहक कम थे, लेकिन जो आते थे वे क्वालिटी से खुश हो जाते. कई लोग तो उनपर हंसे भी और ये तक कहा कि वह इस कारोबार में टिक भी नहीं पाएंगे. लेकिन जवाहरलाल झावेरी ने एक बड़ी स्ट्रैटजी अपनाई, उन्होंने हाई क्वालिटी के मसाले घर-घर जाकर देना शुरू किए. धीरे-धीरे मुंह-जुबानी नाम फैलने लगा. परिवार भी उनके साथ दिन-रात काम करता, भाई-बहन, पत्नी सबने उनका साथा दिया. घर के एक छोटे से कमरे में वह पैकिंग का काम करते थे और लेबल चिपकाते फिर सुबह-सुबह बाजार में और लोगों के घर जाकर देते.
2000 के बाद बदला काम करने का तरीका
ऐसा नहीं था कि ये ब्रांड रातोंरात फेमस हो गया. कई चुनौतियां सामने आईं. मार्केट में बड़े ब्रांड्स आ रहे थे और कॉम्पिटिशन बढ़ रहा था. कई बार पैसे की किल्लत हुई, उन्हें कच्चा माल खरीदना महंगा पड़ता था. लेकिन जवाहरलाल झावेरी ने कभी क्वालिटी कम नहीं की. वे खुद बाजार जाते, किसानों से सीधे मसाले खरीदते ताकि ताजगी बनी रहे. 1990 के दशक में जब पैकेज्ड मसाले का चलन बढ़ा, तब बदशाह ने अच्छे से पैकिंग शुरू की. छोटे पाउच से लेकर बड़े पैक तक. फिर मुंबई से बाहर महाराष्ट्र के दूसरे शहरों में पहुंच गए. ट्रक से सामान भेजना शुरू किया. 2000 के बाद बदशाह ने बड़ा कदम उठाया. उन्होंने फैक्ट्री लगाई, मशीनें लगवाईं. अब मसाले ऑटोमैटिक मशीनों से पीसे जाते, लेकिन टेस्टिंग अभी भी हाथ से होती.
‘स्वाद–सुगंध का राजा’
सिर्फ यही नहीं, उनके विज्ञापन का पहला बड़ा कैंपेन था लोकल ट्रेनों पर बिलबोर्ड लगाना. ऐसा इसलिए क्योंकि उस समय ट्रेनों में लाखों लोग रोज सफर करते थे. बदशाह और निरमा के अलावा कोई और नाम नहीं दिखता था. इन एड की वजह से भी ब्रांड की पहचान मजबूत हुई. जिंगल – ‘स्वाद–सुगंध का राजा’ आने के बाद तो हर कोई यही गुनगुनाते हुए नजर आता था. कंपनी ने अलग-अलग मसाले लॉन्च किए – चाट मसाला, बिरयानी मसाला, पाव भाजी मसाला. सबमें घर जैसा स्वाद रखा. इससे लोग जुड़ गए. आज बदशाह के 100 से ज्यादा प्रोडक्ट हैं और पूरे भारत में उपलब्ध हैं. कंपनी की सालाना कमाई 181 करोड़ रुपये के आसपास है. हजारों लोग इसमें काम करते हैं.
जवाहरलाल झावेरी के बेटे हेमंत झवेरी अब कंपनी की कमान संभाल रहे हैं. वह और उनके परिवार के सदस्य मिलकर नए आइडिया लाते हैं. कंपनी की ऑनलाइन सेल भी बढ़ रही है, एक्सपोर्ट भी शुरू हो गया. हेमंत का मानना है कि मशीन सब कुछ नहीं कर सकती, इंसान का हाथ लगना जरूरी है. उनका मानना है कि ग्राहक को कभी धोखा न देना ही सफलता का राज है. आज भी वह वही मसाले बेचते हैं जो हाई क्वालिटी होते हैं. इससे ये बात तो साफ है कि छोटे से शुरुआत करके भी बड़ा बन सकते हैं. अगर मेहनत, ईमानदारी और क्वालिटी पर फोकस रहे तो रास्ता खुद बन जाता है.
Discover more from Business News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.