दुकान के मालिक प्राण कोहली (Pran Kohli) ने बताया कि फिलहाल गैस सिलेंडर उपलब्ध नहीं होने की वजह से यह फैसला लेना पड़ा. हालांकि उन्होंने भरोसा दिलाया कि जैसे ही गैस की आपूर्ति सामान्य होगी, दुकान फिर से खुल जाएगी. इस बीच ब्रांड के अन्य आउटलेट (राजौरी गार्डन, ग्रेटर कैलाश और लक्ष्मी नगर) पर काम जारी है, जबकि गुरुग्राम और फरीदाबाद में इसकी फ्रेंचाइज़ी भी चल रही है.
लेकिन इस छोटी-सी रुकावट ने एक बार फिर उस कहानी को चर्चा में ला दिया है, जो एक साइकिल से शुरू होकर दिल्ली के सबसे मशहूर छोले-भटूरे ब्रांडों में बदल गई. इस कहानी की शुरुआत भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद के दौर से होती है. महज 15 साल की उम्र में सीता राम कोहली (Sita Ram Kohli) लाहौर से दिल्ली आ पहुंचे. जेब में पैसे नहीं थे, लेकिन अपने शहर के जायके को लोगों तक पहुंचाने का सपना जरूर था.
1955 में शुरू हुआ था सफर
साल 1955 में उन्होंने दीवान चंद के साथ मिलकर पहाड़गंज में डीएवी स्कूल के सामने एक साइकिल पर छोले-भटूरे बेचना शुरू किया. उस साइकिल पर एक पतीला और भटूरों की टोकरी रखी होती थी, लेकिन स्वाद ऐसा था कि धीरे-धीरे लोगों की भीड़ जुटने लगी.
उस समय पास ही स्थित इंपीरियल सिनेमा में फिल्में देखने आने वाले लोग शो खत्म होने के बाद सीधे उनके ठेले पर पहुंच जाते थे. देखते-ही-देखते यह छोटा-सा ठेला इलाके की पहचान बन गया.
साइकिल से रेस्तरां तक का सफर
लगातार बढ़ती लोकप्रियता के चलते 1970 के दशक में इस ठेले ने एक स्थायी दुकान का रूप ले लिया. पहाड़गंज के राजगुरु मार्ग पर बना यह रेस्तरां जल्द ही दिल्ली के फूड लवर्स का पसंदीदा ठिकाना बन गया. समय के साथ परिवार की अगली पीढ़ी ने भी इस विरासत को संभाला. सीता राम के बाद उनके बेटे ने कारोबार को आगे बढ़ाया और नए दौर की चुनौतियों के बीच भी स्वाद की पहचान को बरकरार रखा.
आज इस ब्रांड की कमान तीसरी और चौथी पीढ़ी के हाथों में है. प्राण कोहली के बेटे पुनीत कोहली (Puneet Kohli) ने इसे नई दिशा देते हुए अलग-अलग इलाकों और शहरों तक पहुंचाया. 2008 में पीतमपुरा, 2017 में पश्चिम विहार और बाद में गुरुग्राम तक इसके नए आउटलेट खुले.
स्वाद का राज क्या है?
दिल्ली में छोले-भटूरे की हजारों दुकानें हैं, लेकिन इस दुकान की लोकप्रियता की वजह उसका अलग अंदाज है. यहां भटूरे सामान्य दुकानों की तरह तेल में डूबे हुए नहीं मिलते. आटे में पनीर, अजवाइन, मेथी और हींग मिलाकर खास तरह से तैयार किया जाता है, जिससे भटूरे हल्के और खुशबूदार बनते हैं.
परोसने से पहले भटूरे को तवे पर दोबारा गर्म किया जाता है, जिससे अतिरिक्त तेल निकल जाता है और वे बेहद मुलायम हो जाते हैं. वहीं छोले करीब 20 से ज्यादा मसालों के मिश्रण से तैयार किए जाते हैं. ये मसाले बाजार से तैयार नहीं खरीदे जाते, बल्कि घर में साफ करके पीसे जाते हैं.
प्लेट में मिलने वाली खट्टी-मीठी चटनी सूखे अनारदाने से बनाई जाती है, जबकि साथ में दिया जाने वाला अचार मौसम के हिसाब से बदलता रहता है- कभी कच्चे आम का तो कभी आंवले का. यही छोटी-छोटी बातें इस स्वाद को खास बनाती हैं.
आज भी पहाड़गंज की इस दुकान पर सुबह से ही लोगों की लाइन लग जाती है और अक्सर शाम तक सारा खाना खत्म हो जाता है. मशहूर शेफ संजीव कपूर से लेकर बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान तक इसके स्वाद की तारीफ कर चुके हैं.
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