भारत में प्रोटीन प्रोडक्ट की बिक्री तेजी से बढ़ रही है। अमेजन इंडिया के आंकड़े बताते हैं कि प्रोटीन और न्यूट्रिशन पोर्टफोलियो में 35% की बढ़ोतरी हुई, जबकि सामान्य एफएमसीजी सेक्टर की ग्रोथ सिर्फ 9% है। आईएमएआरसी का अनुमान है कि 2024 में भारत का प्रोटीन सप्लीमेंट बाजार 7,461 करोड़ रुपए का था, जिसके 2033 तक 13,186 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है। प्रोटीन सप्लीमेंट्स के प्रीमियम प्रोडक्ट (~4,500 से अधिक दाम वाले) की बिक्री सामान्य से 3.5 गुना तेजी से बढ़ रही है। यह ग्रोथ केवल बड़े शहरों तक नहीं है, जहां बेंगलुरु जैसे शहर 50-59% की दर से बढ़ रहे हैं। कोल्हापुर, मंगलुरु, देहरादून और अंबाला जैसे टियर-2,3 शहरों में भी 40% की ग्रोथ देखी जा रही है। रेडसीर स्ट्रैटजी कंसल्टेंट्स के मृगांक गुटगुटिया का कहना है कि भारत में अब लोग सेहत के लिए प्रीमियम देने को तैयार हैं। अंडे को ही लें, 2011 में खपत 2,500 टन थी, जो 2024 में 5 हजार टन पहुंच गई। अंडे का बाजार सालाना 7% बढ़ रहा है और 70 हजार करोड़ रुपए का हो गया है। क्या प्रोटीन सप्लीमेंट्स वाकई पोषण की समस्या सुलझाने में सक्षम हैं? जो प्रोडक्ट किफायती दाम पर 60 ग्राम प्रोटीन उपलब्ध कराएंगे, वो ही टिकेंगे आईसीएमआर के अनुसार, एक स्वस्थ वयस्क को रोजाना औसतन 60 ग्राम प्रोटीन लेना चाहिए। शहरी भारत में प्रोटीन की खपत औसतन 37 ग्राम है। कंपनियां ने इसी गैप को पहचान लिया है। प्रोटीन कुल्फी, प्रोटीन लस्सी, प्रोटीन छाछ और प्रोटीन पनीर जैसे टर्म से प्रोडक्ट की ब्रांडिंग कर रही हैं। उदाहरण के लिए जो प्रोडक्ट ~20 में बिकता था, उसके हाई-प्रोटीन वर्जन को ~30 या ~40 में बेचना आसान हो गया है। ‘हेलो हेल्थ’ को भी पहचानें विशेषज्ञों का कहना है कि एक कुल्फी में 10 ग्राम प्रोटीन है, जो दैनिक जरूरत का 15-20% है। वैसे ही, प्रोटीन ब्रेड में सामान्य ब्रेड से 1-2 ग्राम प्रोटीन ज्यादा होता है। कई बार हाई प्रोटीन के नाम पर बेचे जाने वाले स्नैक्स में शुगर और फैट की मात्रा ज्यादा होती है। ये ‘हेल्थ हेलो’ इफेक्ट है, जहां हम एक अच्छी चीज के चक्कर में बाकी नुकसानदेह चीजों को नजरअंदाज कर देते हैं। दावे खोखले, रिस्की भी 75% प्रोटीन प्रोडक्ट्स में लेड, 27.8% में कैडमियम और 94.4% में कॉपर मिली। 69.4% यानी 25 प्रोडक्ट्स पर जितना प्रोटीन लिखा था, असल में उससे 10 से 50% कम प्रोटीन था। ये नतीजा जर्नल मेडिसिन में 2024 में प्रकाशित केरल के राजगिरी हॉस्पिटल के डॉ. सिरिएक एब्बी फिलिप्स की रिसर्च में निकाला गया है। तो बेक्ड नॉट फ्राइड की तरह यह ट्रेंड खत्म हो सकता है
प्रोटीन की कमी असली समस्या है। कंपनियां इसे एक मौके की तरह देख रही हैं। जो कंपनियां स्वाद से समझौता नहीं करेंगी, दाम सामान्य रखेंगी वहीं टिकेंगी वरना यह ट्रेंड भी 2016 के ‘बेक्ड नॉट फ्राइड’ की तरह खत्म हो जाएगा, जहां चिप्स, नमकीन के पैकेट पर ऐसे दावे किए गए, पर स्वाद और संतुष्टि की कमी के कारण सफल नहीं हो पाया।
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