वित्त वर्ष 2025-26 की अक्टूबर से दिसंबर तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था 7.8% की दर से बढ़ी. सरकार के नए जीडीपी सीरीज के आंकड़ों में यह जानकारी दी गई है. 7.8% की यह ग्रोथ रेट इस बात का सबूत है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों (जैसे ट्रंप के टैरिफ) को सहने और उनसे उबरने में सक्षम है. नई जीडीपी सीरीज ने न केवल आंकड़ों की विश्वसनीयता बढ़ाई है, बल्कि भारत को ग्लोबल निवेश के लिए सबसे आकर्षक डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित कर दिया है.
7.8% रही तीसरी तिमाही में GDP की रफ्तार
शुक्रवार (27 फरवरी) को जारी इन आंकड़ों की सबसे खास बात यह है कि सरकार ने जीडीपी मापने का तरीका (GDP New Series) बदल दिया है, जिससे अब देश की आर्थिक तरक्की की ज्यादा सटीक तस्वीर सामने आएगी.
डनई सीरीज: गणना के तरीके में क्या हुआ बदलाव?
जीडीपी मापने की पद्धति में बदलाव केवल कागजी नहीं है, बल्कि यह जमीनी हकीकत को दर्शाने का एक नया चश्मा है. सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI) ने इसमें कई बड़े बदलाव किए हैं:
- बेस ईयर में बदलाव (Base Year 2022-23): अब तक जीडीपी की गणना 2011-12 की कीमतों पर आधारित थी, जो अब पुरानी पड़ चुकी थी. अब इसे बदलकर 2022-23 कर दिया गया है. इससे पिछले एक दशक में आए औद्योगिक बदलाव और नई कीमतों का सही असर आंकड़ों में झलकेगा.
- GST और डिजिटल डेटा का समावेश: पहली बार जीएसटी (GST) पोर्टल के वास्तविक डेटा का उपयोग कॉर्पोरेट सेक्टर की ग्रोथ मापने के लिए किया गया है. इसके अलावा, वाहनों के रजिस्ट्रेशन के लिए ‘ई-वाहन’ डेटा का इस्तेमाल निजी खर्च को समझने के लिए किया जा रहा है.
- इनफॉर्मल सेक्टर और गिग इकोनॉमी: भारत की एक बड़ी आबादी ‘गिग इकोनॉमी’ (जैसे जोमैटो, स्विगी, ओला के पार्टनर्स) और घरों में काम करने वाले सहायक (कुक, ड्राइवर) के रूप में काम करती है. नई सीरीज में इन ‘घरेलू नियोक्ताओं’ के योगदान को भी शामिल किया गया है, जिससे अर्थव्यवस्था का दायरा बढ़ गया है.
- डबल डिफ्लेशन: अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाते हुए अब इनपुट (कच्चा माल) और आउटपुट (तैयार माल) की कीमतों को अलग-अलग एडजस्ट किया जाएगा. इससे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की असली ‘वैल्यू एडिशन’ का पता चल सकेगा.
आम आदमी की जेब पर क्या होगा इसका असर?
जब जीडीपी 7.8% की दर से बढ़ती है, तो इसका सीधा असर आपके जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर पड़ता है:
- रोजगार के नए अवसर: मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में 7% से ज्यादा की तेजी यह संकेत देती है कि कंपनियां अपना विस्तार कर रही हैं. जब प्रोडक्शन बढ़ता है, तो नई नौकरियों की जरूरत पड़ती है. विशेषकर युवाओं के लिए यह एक पॉजिटिव संकेत है.
- सैलरी और बोनस की उम्मीद: मजबूत जीडीपी ग्रोथ का मतलब है कि कॉर्पोरेट इंडिया का मुनाफा सुधर रहा है. टीओआई से बात करते हुए आनंद राठी ग्रुप के चीफ इकोनॉमिस्ट सुजन हाजरा के मुताबिक, बेहतर आर्थिक आंकड़े कॉर्पोरेट अर्निंग्स को सहारा देंगे, जिसका फायदा आने वाले समय में कर्मचारियों को इंक्रीमेंट के रूप में मिल सकता है.
- महंगाई पर लगाम: ‘डबल डिफ्लेशन’ और सटीक डेटा गणना से सरकार को महंगाई को समझने और उसे कंट्रोल करने के लिए बेहतर नीतियां बनाने में मदद मिलेगी. इससे आपकी बचत पर पड़ने वाला दबाव कम हो सकता है.
- निवेशकों के लिए खुशखबरी: जीडीपी के इन आंकड़ों ने शेयर मार्केट और डेट मार्केट के प्रति निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है. आपके म्यूचुअल फंड और स्टॉक्स के बेहतर प्रदर्शन की संभावना बढ़ गई है.
दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ताकत बनने का सफर
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के मुताबिक, भारत जल्द ही जापान और जर्मनी को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है. चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने अनुमान लगाया है कि अगले वित्त वर्ष 2026-27 तक भारत 4 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बन जाएगा.
पर कैपिटा इनकम के मामले में चुनौती
हालांकि, एक्सपर्ट एक चुनौती की ओर भी इशारा करते हैं. भले ही भारत की कुल इकोनॉमी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन पर कैपिटा इनकम के मामले में हम अभी भी अमेरिका, जर्मनी और जापान जैसे देशों से काफी पीछे हैं. असली चुनौती इस विकास का लाभ समाज के सबसे निचले पायदान तक पहुंचाने की है.
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प्रिंट मीडिया से करियर की शुरुआत करने के बाद पिछले 8 सालों से News18Hindi में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर कार्यरत हैं. लगभग 4 सालों से बिजनेस न्यूज टीम का हिस्सा हैं. मीडिया में करीब डेढ़ दशक का अनुभव रखते हैं. बिजन…और पढ़ें
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