स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते तनाव का असर अब सिर्फ तेल तक सीमित नहीं रहा है. इस रास्ते के प्रभावित होने से दुनिया भर में सल्फर की सप्लाई भी टूटने लगी है, जिससे कई उद्योगों पर दबाव बढ़ गया है. सल्फर आधुनिक उद्योगों के लिए बेहद अहम कच्चा माल है. चिप निर्माण, इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी, मेटल रिफाइनिंग और खाद उत्पादन जैसे क्षेत्रों में इसका बड़ा उपयोग होता है. होर्मुज मार्ग पर संकट गहराने से इन उद्योगों की लागत बढ़ने का खतरा बढ़ गया है.
सल्फ्यूरिक एसिड क्रूड ऑयल रिफाइनिंग से निकलने वाला एक बाय प्रोडक्ट है. (Photo- AI)
दुनिया के समुद्री व्यापार में होने वाले सल्फर का लगभग आधा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है. इसका कारण यह है कि खाड़ी क्षेत्र के देश जैसे सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत भारी मात्रा में ऐसा कच्चा तेल निकालते हैं जिसमें सल्फर की मात्रा ज्यादा होती है. जब इस तेल को रिफाइन किया जाता है तो उससे बाय प्रोडक्ट के रूप में बड़ी मात्रा में सल्फर निकलता है. यही वजह है कि ये देश दुनिया के सबसे बड़े सल्फर निर्यातकों में शामिल हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही पर खतरा बढ़ने से इस पूरे व्यापार पर दबाव आ गया है.
तकनीक और उद्योगों पर असर
सल्फर सिर्फ एक रासायनिक पदार्थ नहीं है बल्कि आधुनिक औद्योगिक ढांचे का अहम हिस्सा है. चिप बनाने की प्रक्रिया में सिलिकॉन वेफर को साफ करने और प्रोसेस करने के लिए बेहद प्योर सल्फ्यूरिक एसिड की जरूरत होती है. मोबाइल फोन, कंप्यूटर और इलेक्ट्रिक वाहनों में लगने वाली चिप्स के उत्पादन में यह एक महत्वपूर्ण चरण माना जाता है.
इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी के लिए जरूरी धातुएं जैसे निकल और कॉपर को अयस्क (Ore) से निकालने में भी सल्फ्यूरिक एसिड का उपयोग होता है. इसके बिना इन धातुओं की रिफाइनिंग मुश्किल हो जाती है. खाद उद्योग भी इस पर काफी हद तक निर्भर है. फॉस्फेट आधारित खाद बनाने में सल्फर का बड़ा उपयोग होता है और इसकी कमी खाद उत्पादन को प्रभावित कर सकती है.
कीमतों में तेजी के संकेत
दुनिया का सबसे बड़ा सल्फर खरीदार चीन है. बाजार विश्लेषण करने वाली संस्था आर्गस की रिपोर्ट के अनुसार होर्मुज क्षेत्र में तनाव बढ़ने के एक सप्ताह के भीतर चीन के बंदरगाहों पर सल्फर की कीमतों में करीब 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. अगर यह समुद्री मार्ग लंबे समय तक प्रभावित रहता है तो वैश्विक बाजार में हर साल लगभग 3 से 4 करोड़ टन तक सल्फर की कमी पैदा हो सकती है. सल्फर की कमी का सीधा असर सल्फ्यूरिक एसिड की कीमतों पर पड़ेगा. अनुमान है कि इससे चिप निर्माण की लागत में 5 से 8 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है.
विकल्प खोजना आसान नहीं
दुनिया में कनाडा और रूस जैसे कुछ अन्य देश भी सल्फर का उत्पादन करते हैं, लेकिन वे इतनी जल्दी अपनी सप्लाई नहीं बढ़ा सकते कि खाड़ी देशों से होने वाली कमी की भरपाई कर सकें. इसके अलावा समुद्री जहाजों से होने वाली सप्लाई का बड़ा हिस्सा अभी भी होर्मुज मार्ग पर निर्भर है, इसलिए संकट गहराने पर वैश्विक उद्योगों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है. कुल मिलाकर देखा जाए तो तेल के बाद अब सल्फर की सप्लाई पर पड़ा असर यह संकेत दे रहा है कि अगर यह संकट लंबा चला तो इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, वाहन और खाद जैसे कई क्षेत्रों में कीमतें बढ़ने का दबाव बन सकता है.
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जय ठाकुर 2018 से खबरों की दुनिया से जुड़े हुए हैं. 2022 से News18Hindi में सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं और बिजनेस टीम का हिस्सा हैं. बिजनेस, विशेषकर शेयर बाजार से जुड़ी खबरों में रुचि है. इसके अलावा दे…और पढ़ें
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