अमेरिकी ट्रेजरी बाजार को दशकों से दुनिया का सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है. लेकिन 2026 में हालात बदलते दिख रहे हैं. बढ़ते अमेरिकी कर्ज, ऊंची ब्याज दरों और यील्ड कर्व के असामान्य ढांचे ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह सेफ हेवन अब खुद वैश्विक अस्थिरता का स्रोत बनता जा रहा है.
अमेरिकी 10 वर्षीय ट्रेजरी यील्ड को ग्लोबल रिस्क फ्री रेट माना जाता है. हर एसेट की कीमत किसी न किसी रूप में इसी से जुड़ी होती है. जब ट्रेजरी की कीमत बढ़ती है तो यील्ड गिरती है. जब निवेशक बेचते हैं तो यील्ड बढ़ती है. यही सीसॉ नियम है. अगर 10 वर्ष की यील्ड बढ़ती है तो शेयरों के वैल्यूएशन पर दबाव आता है क्योंकि भविष्य की कमाई को ज्यादा दर से डिस्काउंट किया जाता है. इससे खासकर ग्रोथ स्टॉक्स प्रभावित होते हैं. दूसरा असर पूंजी प्रवाह पर पड़ता है. ऊंची अमेरिकी यील्ड उभरते बाजारों से पैसा खींच लेती है. विदेशी निवेशक जोखिम घटाते हैं और डॉलर मजबूत होता है. तीसरा असर उधारी लागत पर पड़ता है. जब अमेरिकी यील्ड बढ़ती है तो वैश्विक स्तर पर बॉन्ड यील्ड बढ़ती है और कंपनियों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है.
यील्ड कर्व में असामान्य संकेत
इस समय एक अजीब संतुलन बना हुआ है. फेडरल रिजर्व की सख्त नीति के कारण शॉर्ट टर्म दरें ऊंची बनी हुई हैं. लेकिन लंबी अवधि की यील्ड में समय समय पर गिरावट देखी जा रही है क्योंकि निवेशक भविष्य को लेकर अनिश्चित हैं. इससे यील्ड कर्व में ट्विस्ट बन रहा है. ऊंची अल्पकालिक दरें और अपेक्षाकृत नरम दीर्घकालिक यील्ड बाजार में गहरे असमंजस का संकेत देती हैं. यह स्थिति बताती है कि निवेशक न पूरी तरह आश्वस्त हैं और न पूरी तरह घबराए हुए.
फिस्कल डोमिनेंस का दौर
अब सबसे बड़ा बदलाव अमेरिकी राजकोषीय स्थिति से जुड़ा है. अमेरिका का सरकारी कर्ज लगातार बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में यह सकल घरेलू उत्पाद के बड़े हिस्से तक पहुंच सकता है. लगातार बजट घाटा बाजार को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या लंबी अवधि में ट्रेजरी को पूरी तरह जोखिम मुक्त माना जा सकता है. क्वांटिटेटिव ईजिंग के दौर में केंद्रीय बैंक बॉन्ड खरीदकर यील्ड को नियंत्रित करते थे. लेकिन अब सरकारों की भारी उधारी के कारण बाजार आपूर्ति दबाव को भी कीमत में शामिल कर रहा है. यही वह बिंदु है जहां सेफ हेवन और संरचनात्मक जोखिम के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है.
भारत की बात
भारत में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है. पहले विदेशी निवेशकों की बिकवाली से बाजार बुरी तरह प्रभावित होते थे. अब घरेलू संस्थागत निवेशक और नियमित एसआईपी निवेश बाजार को सहारा देते हैं. इससे अमेरिकी यील्ड में उछाल का असर पूरी तरह वैसा नहीं रहता जैसा पहले होता था. फिर भी अगर अमेरिकी 10 वर्षीय यील्ड में तेज और लगातार वृद्धि होती है, तो भारतीय बाजार, रुपया और पूंजी प्रवाह प्रभावित हो सकते हैं.
निवेशकों के लिए संकेत
अब सिर्फ घरेलू सूचकांकों को देखना पर्याप्त नहीं है. निवेशकों को अमेरिकी 10 वर्षीय यील्ड, दो और दस वर्ष के स्प्रेड और डॉलर की दिशा पर नजर रखनी चाहिए. पोर्टफोलियो बनाते समय यह समझना जरूरी है कि वैश्विक तरलता चक्र और अमेरिकी राजकोषीय स्थिति आने वाले वर्षों में एसेट रिटर्न को प्रभावित कर सकते हैं.
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जय ठाकुर 2018 से खबरों की दुनिया से जुड़े हुए हैं. 2022 से News18Hindi में सीनियर सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं और बिजनेस टीम का हिस्सा हैं. बिजनेस, विशेषकर शेयर बाजार से जुड़ी खबरों में रुचि है. इसके अलावा दे…और पढ़ें
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